कुमाऊँ

(नई दिल्ली) उत्तराखंड के महान संस्कृत विद्वान आचार्य दिनेश चन्द्र जोशी के सम्मान में जारी हुआ स्मारक डाक टिकट, देशभर में मनाया जाएगा जन्मशती वर्ष

नई दिल्ली/उत्तराखंड

 

प्रख्यात संस्कृत विद्वान, आध्यात्मिक चिंतक और भारतीय संस्कृति के महान संवाहक आचार्य दिनेश चन्द्र जोशी की जन्मशती वर्ष के अवसर पर भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय, साहित्य अकादेमी, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में नई दिल्ली में राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस दौरान आचार्य दिनेश चन्द्र जोशी के सम्मान में स्मारक डाक टिकट का भी विमोचन किया गया।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए संस्कृति मंत्रालय के संयुक्त सचिव समर नंदा ने कहा कि आचार्य दिनेश चन्द्र जोशी केवल संस्कृत के विद्वान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा और आध्यात्मिक चेतना के सशक्त प्रहरी थे। उनका जन्म 11 अप्रैल 1926 को उत्तराखंड के नैनीताल जनपद के मटेला गांव में हुआ था। सीमित संसाधनों और कठिन पर्वतीय परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपने ज्ञान, तप और आध्यात्मिक साधना के बल पर देशभर में विशिष्ट पहचान बनाई।
उन्होंने जीवनभर संस्कृत भाषा, वैदिक संस्कृति, भारतीय ज्ञान परंपरा और आध्यात्मिक मूल्यों के संरक्षण व संवर्धन के लिए कार्य किया। आचार्य जोशी ने युवाओं को संस्कृत, योग, आयुर्वेद, वास्तुशास्त्र, संस्कृत पत्रकारिता और पांडुलिपि संरक्षण से जोड़ने का अभियान चलाया। इसी उद्देश्य से उन्होंने वर्ष 2010 में “स्वस्तिवाचनम्” संस्था की स्थापना की। वे युवाओं को “स्वस्तिवाचक” और “स्वस्तिवाचिका” कहकर संबोधित करते थे।
आचार्य दिनेश चन्द्र जोशी के प्रयासों का ही परिणाम था कि वर्ष 2010 में उत्तराखंड सरकार ने संस्कृत को राज्य की द्वितीय राजभाषा घोषित किया। उन्होंने कई जनप्रतिनिधियों को संसद और विधानसभाओं में संस्कृत में शपथ लेने के लिए प्रेरित किया, जिसे भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता के पुनर्जागरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना गया।
समारोह में यह भी घोषणा की गई कि भारत सरकार द्वारा 11 अप्रैल 2026 से 11 अप्रैल 2027 तक देशभर में आचार्य जोशी की स्मृति में संगोष्ठियां, सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रदर्शनियां और आध्यात्मिक आयोजन किए जाएंगे।
साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष डॉ. माधव कौशिक ने कहा कि आचार्य दिनेश चन्द्र जोशी ऋषि परंपरा के प्रतिनिधि थे, जिन्होंने समाज को भारतीय संस्कृति का वास्तविक स्वरूप समझाने का कार्य किया। वहीं केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने कहा कि आचार्य जोशी ने संस्कृत और भारतीय परंपराओं के प्रचार-प्रसार के लिए जीवनभर अथक प्रयास किए और उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।
राष्ट्रीय संगोष्ठी में देशभर से आए विद्वानों और शोधार्थियों ने आचार्य दिनेश चन्द्र जोशी के वैदिक अध्ययन, आध्यात्मिक चेतना, तीर्थ संस्कृति, संस्कृत पत्रकारिता और भारतीय संस्कारों के संरक्षण में उनके योगदान पर विस्तृत चर्चा की। कार्यक्रम का समापन धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।

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